सिन्धु घाटी सभ्यता के समय कृषि व्यवस्था

इस सभ्यता के निर्माताओं के आर्थिक शरीर में कृषि रीढ़ की हड्डी के समान थी। कषि इनका प्रमुख व्यवसाय था, सिन्धु घाटी के किनारे पर यह सभ्यता फूली तथा फली थी। इस कारण इस सभ्यता के समय कृषि की तेजी के साथ उन्नति हुई होगी। इस सभ्यता के किसानों को खेती-बाड़ी करते समय किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं हुआ होगा, क्योंकि उर्वरा भूमि नदी तथा वर्षा के कारण उपजाऊ रूप में हो गई थी।

इस सभ्यता के निर्माताओं को अपनी फसलों की सिंचाई करते समय भी किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं हुआ होगा, क्योंकि यहाँ पर पानी का अभाव कभी नहीं रहा होगा। खेती-बाड़ी का कार्य अच्छे तथा उन्नत रूप में होता था। इस सभ्यता के किसान गेहूँ तथा जौ की खेती विशेषतौर से करते थे तथा किसान गेहूँ, जौ के साथ-साथ वे धान, मटर, तिल, कपास आदि की फसलें उगाते थे। खुदाई में गेहूँ तथा जौ के दाने प्राप्त हुए हैं। अन्न पीसने के लिए पनचक्कियाँ भी थीं तथा फसल खूब पैदा होती थी।

किसान अपनी आवश्यकता से अधिक खाने-पीने की वस्तुएं रखता था तथा शेष फसल की उपज वह बाजार में ले जाकर बेच दिया करता था, जिसके कारण उसकी आर्थिक दशा बहुत ही अच्छी हो गई थी। अनाज रखने के लिए बड़े-बड़े अन्नागार भी होते थे। अनाज ढोने के लिए दो पहिये या । चार पहिए की गाड़ी का प्रयोग किया जाता था।

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