पूर्व-गुप्तकाल से गुप्तकाल तक कृषि व्यवस्था

पूर्व-गुप्तकाल की आर्थिक दशा की रीढ़ कृषि थी क्योंकि इस समय की भी आर्थिक व्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। इस काल में छोटे बड़े नगरों का विकास हो चुका था। देश में किसानों की संख्या अधिक थी, वे युद्ध तथा अन्य राजनैतिक कार्यों से मुक्त थे। कभी अकाल नहीं पड़ा तथा खाद्यान्न में कभी महंगाई भी नहीं आई। वर्षा के मौसम में दो बार जल-वृष्टि होती थी। जाडे के मौसम में गेहूँ बोया जाता था। गर्मी में तिल और ज्वार की फसल होती थी। किसान आमतौर से दो फसलें पैदा करते थे। इनके अतिरिक्त फल तथा तरकारियाँ भी पैदा की जाती थीं जिनको मौसम के अनुसार बोया और खाया जाता था। कृषि के द्वारा अनेक प्रकार के अन्न जैसे – ज्वार, चना, मटर, विभिन्न प्रकार की दालें, तेल निकालने वाले पदार्थ तथा फल और तरकारियाँ पैदा की जाती थीं।

इस समय में कृषकों का कार्य बड़ी पूण दाट से देखा जाता था। यद्ध काल के समय में भी कषि को किसी प्रकार की हानि नहीं पाई जाता था। राज्य किसानों की सविधा का बड़ा ध्यान रखता था। शिकारी और सेनिक दोनों हा कृाष को हानि नहीं पहुंचाते थे। शिकारी कृषि की रक्षा के लिए उन जंगली पशुओं को जा उनको हानि पहुंचाते थे, मारते रहते थे।

राज्य की ओर से उन्हें इस काम के लिए भत्ता मिलता था। राज्य बाढ़, अग्नि, टिड्डी दल और अन्य संकटों से कृषि की रक्षा के उपाय करता था। भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए गोबर की खाद का उपयोग किया जाता था। कष्ट के समय किसानों को राज्य की ओर से आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। फसल खराब होने पर उनका सरकारी लगान भी माफ कर दिया जाता था। सरकारी अधिकारी किसानों से लगान वसूल करते समय किसी प्रकार का अत्याचार नहीं करते थे।

फसलें

इस समय में दो मुख्य फसलें होती थीं। एक जाड़ों की फसल जो गेहूँ की फसल कहलाती थी। बड़ी महत्वपूर्ण दृष्टि से देखी जाती थी, इस फसल के अंतर्गत अधिक मात्रा में गेहूँ पैदा करने पर ध्यान दिया जाता था। इसके लिए सरकार की ओर से भी किसानों को हर प्रकार की सहायता दी जाती थी। किसान भी इस फसल की पैदावार को अधिक लाभदायक बनाने हेतु अच्छे कार्य करते थे। दूसरी धान की फसल थी। दोनों फसलों के लिए अच्छे ढंग से खेतों को तैयार किया जाता था। खेतों की जुताई की जाती थी। जुताई करते समय हलों का सहारा लिया जाता था। हल शीशम की लकड़ी के बनाये जाते थे, उनका फाल अच्छे लोहे से बनाया जाता था। जिसका नीचे का भाग नुकीली शक्ल का होता था। इस काल में दोनों फसलों से काफी संख्या में गल्ला जैसे – दालें, तेल के पदार्थ (लाई, सरसों, तिलहन मूंगफली), गेहूँ, जौ, चना, धान, मूंग, मसूर, उरद, अरहर, सरसों, मटर, कपास, आलू, गन्ना, तरबूज, खरबूजा, अंगूर, अनार, सेब, नासपाती, आम, जामुन, आंवला, कटहल, नींबू, किशमिश आदि पैदा कर लिये जाते थे जो देश के निवासियों के एक वर्ष इस्तेमाल करने पर भी बच जाते थे। किसानों के घरों में गेहूँ, चावल, दालें, तेल निकालने वाले पदार्थों का फालतू भंडार सदा रहा करता था।

फसल की बुआई

तिल, ज्वार, चना, मटर, विभिन्न प्रकार की दालें, तेल निकालने वाले पदार्थ तथा फल और तरकारियाँ पैदा की जाती थीं। समय में कृषकों का कार्य बड़ी पूण दाट से देखा जाता था। यद्ध काल के समय में भी कषि को किसी प्रकार की हानि नहीं पाई जाता था। राज्य किसानों की सविधा का बड़ा ध्यान रखता था। शिकारी और सेनिक दोनों हा कृाष को हानि नहीं पहुंचाते थे। शिकारी कृषि की रक्षा के लिए उन जंगली पशुओं को जा उनको हानि पहुंचाते थे, मारते रहते थे। राज्य की ओर से उन्हें इस काम के लिए भत्ता मिलता था। राज्य बाढ़, अग्नि, टिड्डी दल और अन्य संकटों से कृषि की रक्षा के उपाय करता था। भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए गोबर की खाद का उपयोग किया जाता था। कष्ट के समय किसानों को राज्य की ओर से आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। फसल खराब होने पर उनका सरकारी लगान भी माफ कर दिया जाता था। सरकारी अधिकारी किसानों से लगान वसूल करते समय किसी प्रकार का अत्याचार नहीं करते थे।

फसलें – इस समय में दो मुख्य फसलें होती थीं। एक जाड़ों की फसल जो गेहूँ की फसल कहलाती थी। बड़ी महत्वपूर्ण दृष्टि से देखी जाती थी, इस फसल के अंतर्गत अधिक मात्रा में गेहूँ पैदा करने पर ध्यान दिया जाता था। इसके लिए सरकार की ओर से भी किसानों को हर प्रकार की सहायता दी जाती थी। किसान भी इस फसल की पैदावार को अधिक लाभदायक बनाने हेतु अच्छे कार्य करते थे। दूसरी धान की फसल थी। दोनों फसलों के लिए अच्छे ढंग से खेतों को तैयार किया जाता था। खेतों की जुताई की जाती थी। जुताई करते समय हलों का सहारा लिया जाता था। हल शीशम की लकड़ी के बनाये जाते थे, उनका फाल अच्छे लोहे से बनाया जाता था। जिसका नीचे का भाग नुकीली शक्ल का होता था। इस काल में दोनों फसलों से काफी संख्या में गल्ला जैसे – दालें, तेल के पदार्थ (लाई, सरसों, तिलहन मूंगफली), गेहूँ, जौ, चना, धान, मूंग, मसूर, उरद, अरहर, सरसों, मटर, कपास, आलू, गन्ना, तरबूज, खरबूजा, अंगूर, अनार, सेब, नासपाती, आम, जामुन, आंवला, कटहल, नींबू, किशमिश आदि पैदा कर लिये जाते थे जो देश के निवासियों के एक वर्ष इस्तेमाल करने पर भी बच जाते थे। किसानों के घरों में गेहूँ, चावल, दालें, तेल निकालने वाले पदार्थों का फालतू भंडार सदा रहा करता था।फसल की बुआई – प्रत्येक फसल की बुआई ठीक समय पर होती थी। किसान अपने खेतों को फसल बोने से पूर्व अच्छी तरह से तैयार कर लेते थे। खेतों को पहले के मुकाबले में अधिक गहरा जोता जाता था। खेतों की जुताई हल, बैल और जुएं के द्वारा होती थी। जुताई एक भैंसे, दो बैलों, एक ऊंट की सहायता से की जाती थी। इस काल में हल पुराने समय के मुकाबले से अधिक शक्तिशाली और टिकाऊ शीशम की पक्की लकड़ी से बनाये जाते थे, जिनकी बनावट और उपयोगिता पर पहले के मुकाबले में अधिक बल दिया जाता था। हलों को नुकीले रूप में पहले के मुकाबले में बनाया जाता था। खेत जब तैयार हो जाते थे तब उनमें अच्छे किस्म के बीज बोये जाते थे। बीजों के चुनाव पर पहले के मुकाबले अधिक बल दिया जाता था। किसान अपने खेतों में बोने के लिए बीजों की स्वयं व्यवस्था करते थे। घुने दानों को निकाल दिया जाता था। सदा अच्छे बीज का प्रयोग खेतों की बुआई में किया जाता था।

निराई

इस काल में किसान अपनी फसल की निराई भी करते थे। निराई करते समय बेकार घास और अन्य किस्म के पौधों को जड़ से खोद कर निकाल दिया जाता था। किसानों का विश्वास था कि ऐसे घास और पौधे फसल को ठीक विधि से उगने नहीं देते हैं और इनकी बदौलत फसल की उपज ठीक नही होती है। निराई का काम नर और नारियाँ दोनों एक साथ मिलकर करते थे। निराई करते समय वे जो गीत गाते थे, उससे उनकी थकावट दर हो जाती थी। उस समय खेतिहर मजदूर नहीं थे। ग्राम निवासी एक-दूसरे के खेतों की मिल बांटकर निराई करते थे। निराई के द्वारा जो घास, फूस प्राप्त होती थी उससे उनके पशुओं का चारा बनता था।

खाद

जब खेत तैयार हो जाते थे उनमें गोबर की खाद दी जाती थी गोबर को खाद स्वय किसान आर उसके परिवार के सदस्य बनाया करते थे। पशओं का गोबर एक गड्ढे में डाल दतथ आर जब उनको अपने खेतों में गोबर खाद देने की आवश्यकता होती थी, वे अपने गड्ढा से एसा खाद निकालकर अपने खेतों में काफी मात्रा में डाल देते थे। खाद का फलाकर उसका पटल के द्वारा खेत के ऊपरी धरातल पर एक समान फैला दिया जाता था। बाद का सच की गहरी जुताई की जाती थी। गहरी जताई के बाद उस खेत की धरातल को पटेला चलाकर एक समान कर दिया जाता था। पुराने समय में खाद खेत के ऊपरी भाग पर डाली जाता था।

सिचाई

इस युग के किसान अपने खेतों की सिंचाई पहले के मुकाबले में अच्छ ढग से करता था। इस काल के पूर्व का किसान अच्छी उपज के लिए आकाश से हान वाली वर्षा का मंह नहीं ताकता था। जब अच्छी वर्षा होती थी तब अच्छी फसल हाता था। सिचाई की आवश्यकता कम होती थी, परन्तु जब वर्षा कम होती थी तब किसानों को सिंचाई के अनेक साधनों से जल प्रयोग करना पड़ता था। राज्य में नहरें, तालाब, कच्चे-पक्के कुयें, आदि के जल से खेतों की सिंचाई ढेकली के द्वारा की जाती थी। हमारे देश में ढेकली के खेतों की सिंचाई करने की बड़ी प्राचीन व्यवस्था है। इस युग में अच्छे किस्म के डोल बनाये गये और ढेंकली को रस्सी की सहायता से बांधकर उनसे कुएं, तालाबों से पानी निकाल कर किसानों ने अपने खेतों की सिंचाई की अच्छी व्यवस्था करके अच्छी फसल पैदा की।

कुओं, तालाबों आदि से पानी निकालने के लिए डोल, चरस और एक प्रकार की वायु संचालित चक्की का भी प्रयोग किया जाता था। इस समय में सिंचाई के निम्नलिखित साधन थे –

  1. वायु द्वारा संचालित चक्की द्वारा।
  2. नहरों के लिए बांध बनाकर पानी जमा करना।
  3. नदी, तालाब, कुएं और झीलों के पानी द्वारा सिंचाई ।
  4. डोल या चरस द्वारा सिंचाई करने की विधि।
  5. बैलों के द्वारा रहट या चरस के द्वारा सिंचाई करने का तरीका ।

फसल की रक्षा

सिंचाई के साथ-साथ फसल की रक्षा के लिए भी अच्छे उपाय इस समय किये गये जिनकी बदौलत फसल की रक्षा के कारण पैदावार बढ़ी फसल की रक्षा के लिए राज्य की ओर से बहेलियों तथा चरवाहों की नियुक्ति हुई। अकाल की स्थिति का सामना करने के लिए राजकीय खाद्यान्न भंडार भी थे जिनमें फसल के समय अन्न संग्रह किया जाता था। इसमें जो अन्न रखा जाता था उसमें नीम की पत्तियां डाल दी जाती थी ताकि अन्न को हानिकारक कीटाण किसी भी प्रकार से हानि न पहुंचा सके। अनावृष्टि तथा अकाल के समय राज्य की ओर से किसानों को अच्छे बीज, पशु और अन्य उपकरणों को खरीदने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती थी। इससे पता चलता है कि फसल को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त था।

राज्य कर

कृषि की पैदावार का 1/2, 1/3, 1/5 और 1/8 भाग सरकारी कर के रूप में लिया जाता था। फसल की पैदावार को कूटने की कई विधियाँ इस समय प्रचलित थीं। अच्छी भमि के खेतों से पैदावार का 1/3 भाग सरकारी कर के रूप में लिया जाता है। दसरे किस्म की भमि के खेतों से पैदावार का 1/4 भाग और 1/5 भाग कर के रूप में लिया जाता था। जंगली भमि के खेतों से पैदावार 1/8 भाग कर के रूप में सरकार लिया करती थी।

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