ऋग्वैदिक काल के समय की कृषि

आर्य सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी। इस सभ्यता के निर्माताओं के किसानों का मुख्य व्यवसाय कृषि ही था। ऋग्वैदिककाल में कृषि पर विशेष महत्व दिया जाता था। उस समय का किसान अपने खेतों को हल तथा बैलों से जोता करते थे। खेतों में पटेला देने के लिए बैल, भैंसों तथा ऊंटों का भी प्रयोग किया जाता था। घर के सभी सदस्य खेती-बाड़ी के कार्य किया करते थे।

ऋग्वैदिक काल में मुख्य पैदावार गेहूँ, चने तथा जौ की बुआई की जाती थी। खेती से संबंधित अनेक कार्य जैसे – माड़ना, खेत काटना, खेत निराना, खेत जोतना, खेत में पटेला ‘लगाना, खेतों की बुआई करना, खेतों में उगे पौधों की निराई करना, ठीक समय पर सिंचाई करना आदि प्रचलित थे, जिनको ऋग्वैदिक काल के किसान अकेले तथा सामूहिक रूप से करते थे। अच्छी फसल की पैदावार के लिए देवताओं से प्रार्थना भी की जाती थी।

ऋग्वैदिक काल का प्रमुख पेशा कृषि ही था। जब आर्य जाति ने सिन्धु घाटी की सभ्यता के निर्माताओं को रणभूमि में हरा दिया और उनको अपना दास बना लिया तब उनसे कृषि के कार्य कराये गये। अतः ऋग्वैदिक काल में कृषि की प्रतिष्ठा स्थापित हो चुकी थी। इस युग का किसान गेहूँ तथा जौ की खेती के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के फूल, तरकारियाँ तथा अनेक प्रकार की दालों की भी पैदावार अच्छी प्रकार से होती थी। अच्छी फसल पैदा करने के लिए ऋग्वैदिक काल का किसान ठीक समय पर अपनी फसल की सिंचाई करते थे तथा अपने खेतों को गोबर की खाद भी देते थे। इस खाद को वे स्वयं तैयार किया करते थे।

खेतों की सिंचाई ढेकली के द्वारा की जाती थी। कुएं, तालाब, झील, पोखर तथा नदियों के पानी से खेतों की सिंचाई की जाती थी। इस समय खेत किसानों की व्यक्तिगत संपत्ति थे, परन्तु चरागाह सामूहिक रूप में थे, जिसकी घास हर किसान के जानवर चरा करते थे। फसल को कीड़े, मकोड़े तथा हानि पहुंचाने वाले पशुओं से भी बचाया जाता था।

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