उत्तर वैदिक काल में कृषि की दशा

इस काल तक पहुंचते-पहुंचते कृषि के रूप में परिवर्तन हए जिनके कारण कृषि की तेजी से उन्नति हुई। इस युग के किसानों ने कृषि के अनेक कार्यों में परिवर्तन करके उनमें महत्वपूर्ण सुधार किये, जिसके कारण किसानों की आर्थिक दशा ऋग्वैदिक काल के मुकाबले अच्छी हो गई।

काटक संहिता में उल्लेख है कि खेतों की जुताई करते समय 24 बैलों को हल में जोता जाता था। कृषि अधिक भूमि में की गई। शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में कृषि सम्बन्धी जो उल्लेख को मिलते हैं। उनसे पता चलता है कि इस काल में कृषि के क्षेत्र में अधिक उन्नति हुई थी। गोबर की खाद का भी उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में देखा जा सकता है। फसल की अच्छी उपज के लिए खाद भी फसल बोने से पूर्व डाली जाती थी। अनेक प्रकार के अनाज, दाल, तिलहन, कपास, मूंगफली, गत्रा आदि की खेती हुआ करती थी। सिंचाई, कुओं, नहरों तथा तालाबों के पानी से होती थी, एक वर्ष में दो फसलें उगाई जाती थीं। इन दोनों फसलों को बोने तथा काटने का समय भी निश्चित हो चुका था। 

तैत्तरीय सहिता से ज्ञात होता है कि जौ, गेहूँ जाड़े के मौसम में बोया जाता था तथा गर्मी में काटा जाता था। धान की फसल बरसात के मौसम में बोई जाती थी और सर्दी के मौसम में काटी जाती थी। उड़द तथा तिलहन भी वर्षाकाल में बोये जाते थे। बाद में उत्तर वैदिक काल के किसान एक वर्ष में तीन फसलें पैदा करने लगे थे।

खेतों की जुताई

उत्तर वैदिक काल में ऋग्वैदिक काल के मुकाबले में खेतों की जुताई के लिए छः, आठ, बारह तथा कभी-कभी सोलह या चौबीस बैलों का प्रयोग किया जाता था। खेतों की जुताई गहरे रूप में की जाती थी तथा खेतों के डेले बारीक करने हेतु पटेला भी चलाया जाता था। खेतों की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने के लिए साल में हर फसल से पूर्व खेतों में गोबर की खाद भी दी जाती थी।

सिंचाई व्यवस्था

उत्तर वैदिक काल में सिंचाई की व्यवस्था भी अच्छे रूप में थी। मैदानी इलाके के खेत कच्चे कुएं के पानी से ढंकली द्वारा सींचे जाते थे। नदियों, झीलों, तालाबों, पोखरों के पास के खेतों की सिंचाई इनके पानी से कई सिंचाई के तरीकों से की जाती थी। वर्षा के पानी को एक गहरे गडडे में रोका जाता था और फिर उसका प्रयोग सिंचाई में किया जाता था।

फसल की रक्षा

फसल की रक्षा तथा सुरक्षा की जाती थी। चिड़ियों तथा पशुओं से फसल को सरक्षित रखने हेतु एक मनुष्य का पुतला बांस की खपच्चियों से तैयार करके उसको मनष्य जैसे कपडे पहनाकर खेतों के बीच तथा कोने में लगा दिये जाते थे। जिनके कारण पशुओं तथा पक्षियों से फसल को हानि कम होती थी। कीड़ों से फसल को बचाने के लिए उनके पत्तों पर चल्हे की राख डाली जाती थी, फिर भी चूहे तथा अन्य छोटे-छोटे कीटाणुओं से खडी फसल को हानि पहुंचती थी।

किसान

इस समय कि किसान ग्रामों में रहता था जिसके मकान लकडी तथा घास-फस से बनाये जाते थे। उनकी सबसे बड़ी दौलत उनके पशु थे, जिस किसान के पास अधिक पश होते थे उनकी गणना धनी किसानों में होती थी। किसान को परिवार के सभी छोटे-बडे सदस्यों को खेती-बाडी सम्बन्धित कोई न कोई कार्य अवश्य करना पड़ता था।

भमि की किस्में

इस समय कितने प्रकार की भूमि थी? उनकी समस्त किस्मों के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त होती थी। हर भूमि में जैसी पैदावार होती थी, उसका भी उल्लेख देखने को मिलता है। इन भमियों की अपनी अलग-अलग कर व्यवस्था थी, जिसकी किसान अपनी सूविधा के अनसार राज्य को देता था। कृषि की यही व्यवस्था 300 ई0 तक किसी न किसी रूप में अवश्य बनी रही।

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